‘इन गलियों में’ सांप्रदायिकता के माहौल से घिरी एक प्रेम कहानी – डॉ अवन्तिका सिंह Purvanchal 24×7 News

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‘इन गलियों में’
सांप्रदायिकता के माहौल से घिरी एक प्रेम कहानी

डॉ अवन्तिका सिंह

आज की सर्वाधिक चर्चित फिल्म – ‘इन गलियों में’ है। इस फिल्म के निर्देशक हैं अविनाश दास जो फिल्म -‘अनारकली ऑफ आरा’ से चर्चा में आए थे। तब उन्होंने लीक से हट कर फिल्म बनाई और अपनी एक अलग पहचान के साथ सिनेमा की दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। यह उनकी दूसरी फिल्म है जो सिनेमाघरों में आ चुकी है। आजादी के पहले भी हिंदू-मुस्लिम सौहार्द पर हिंदी में कई फिल्में बन चुकी हैं। उस दृष्टिकोण से अविनाश दास की फिल्म-‘ इन गलियों में’ नई फिल्म नहीं है लेकिन यह फिल्म आज उस माहौल में रिलीज हुई है जब हिंदू-मुस्लिम का विषय सामाजिक-राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं।

देश में रमज़ान और होली का त्योहार भी साथ साथ है। फिल्म में रहमान गली और हनुमान गली को बड़े सहज और दिलचस्प अंदाज में दिखाया गया है। जहां होली और ईद साथ साथ मनाई जाती है। यह फिल्म उस भाई चारे की मिसाल पेश करती है जो सोशल मीडिया पर नफरत से भरे प्रचारों से बदनाम हो चुका है। यह फिल्म सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचारों के माध्यम से कैसे नफरत फैलाई जाती है इस विभाजनकारी राजनीति को बखूबी उजागर करती है। फिल्म में नफरत का अंजाम मिर्जा चाचा (जावेद जाफरी) को अपनी जान गंवा कर चुकाना पड़ता है। फिल्म की कथावस्तु सांप्रदायिकता के माहौल से घिरी एक प्रेम कहानी है, जिसे बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है।

फिल्म में दिखाया गया कि सांप्रदायिक माहौल कैसे बिगाड़ा जाता है और वोट के लिए कैसी कैसी गोटियां बिठाई जाती हैं इस पर तीखा तंज कसा गया है। चुनावी मौसम में अजय तिवारी (सुशांत सिंह) अपने निर्वाचन क्षेत्र में सांप्रदायिक विभाजन के बीज बोता है जिससे चुनाव में उसका राजनीतिक दबदबा बढ़ सके। लेकिन चाय के साथ, कबीर के दोहे , शेर ओ शायरी और कविता का मिश्रण बेचने वाले मिर्ज़ा चाचा (जावेद जाफ़री) उसकी राह में रोड़ा साबित होते हैं। अतीत के घावों को सहलाते हुए मिर्जा कहते हैं कि देश बदला लेने की संस्कृति के बिना भी चल सकता है। देश प्रणाम, सत श्री अकाल, सलाम से चलेगा नफरत से नहीं।
अनारकली ऑफ आरा फेम निर्देशक अविनाश दास देसी परिवेश में प्रगतिशील और उदार विचारों को दर्शाने की खूबी रखते हैं। वे फिल्म में राजनीति में लगातार आ रही गिरावट और वोट लेने के पैंतरे बाजी को उजागर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। एक पागल (इश्तियाक खान) के माध्यम से सत्ता को सचाई का आईना दिखाते हैं। जो भारत की आत्मा की खोज के लिए फिल्म के बीच बीच में आकर निरंतर लोगों से अपील करता है। जो एक समझदार सोच की तरफ इशारा करता है। अवंतिका दासानी और विवान शाह (जो फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक के बेटे) फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में हैं। उनके साथ जावेद जाफरी अहम भूमिका निभा रहे हैं। साथ राजेंद्र ध्यानी, सुशांत सिंह की अभिनय अच्छा है। यदुनाथ फिल्म्स द्वारा प्रस्तुत ‘इन गलियों में’ विनोद यादव और नीरू यादव द्वारा निर्मित और जांनिसार हुसैन, आदर्श सक्सेना, संजीव गोस्वामी और अल्कोर प्रोडक्शंस द्वारा सह-निर्मित है।
विवान शाह ने अपने किरदार को बड़ी ईमानदारी और गहराई से निभाया है। उनके डायलॉग्स और एक्सप्रेशन बहुत स्वाभाविक हैं जिसे देखकर ऐसा लगता है कि एक वास्तविक इंसान की कहानी है।

फिल्म “इन गलियों में”, वसु मालवीय के पुत्र पुनर्वसु की तरफ से अपने पिता को श्रद्धांजलि है। वसु मालवीय हिंदी के जाने माने लेखक थे। 32 साल की उम्र में वह इस दुनिया को अलविदा कह गये। फिल्म की पटकथा पुनर्वसु ने लिखी है, ज़्यादातर गीत भी उन्होंने ही लिखे है, गीतों की शुरुआती धुन भी उन्होंने ही तैयार की है। इस फिल्म को देखने के बाद, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं उन सकरी गलियों में खुद सफर कर रही हूँ, जहाँ किरदारों की कहानियाँ फिल्मी परदे तक सीमित नहीं बल्कि हकीकत के बहुत करीब हमारे आस पास ही हैं।

यह एक आम बॉलीवुड फिल्म नहीं है, बल्कि इसमें जीवन की हकीकत से भरे मीठे और तीखे सच को खूबसूरती से दिखाया गया है। अविनाश दास ने हर सीन को बहुत सोच-समझकर फिल्माया है। लखनऊ में लोकेशन का चयन बहुत सही तरीके से कहानी की मांग के हिसाब से किया है। जिससे यह फिल्म वास्तविकता के करीब लगती है और दर्शक को उस माहौल का हिस्सा बना देती है। वह उससे जुड़ा हुआ महसूस करता है।

अगर आप “Gully Boy” जैसी फिल्मों के फैन हैं, तो यह फिल्म भी आपको जरूर पसंद आएगी, क्योंकि इसमें भी समाज का एक वास्तविक रूप देखने को मिलता है। फिल्म का संगीत इसकी आत्मा है। फिल्म के गाने माहौल को हल्का करने के साथ साथ इसकी कहानी के पहलुओं को और भी मजबूत बनाते हैं और इसे आगे बढ़ाने का काम करते हैं। सभी गाने बहुत अच्छे और कर्णप्रिय हैं जिन्हें बार बार सुनने को मन करता है।

फिल्म की कहानी, किरदार और शानदार सिनेमेटोग्राफी इसे दूसरी सांप्रदायिक मुद्दों पर बनी फिल्मों से अलग, कुछ खास बनाती है। आर्ट फॉर्म की तरह देखने पर यह फिल्म मन में अपनी जगह बना लेती है। लखनऊ की शूटिंग और शहर के लोगों में शायर (हिमांशु बाजपेई), एक झलक में मेडुसा को देखना अच्छा लगा। राजेंद्र ध्यानी को देखकर बेहद खुशी हुई। उनका लंबा रोल है और अच्छी एक्टिंग की है।

अगर आप ऐसी फिल्मों को पसंद करते हैं, जो सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि गंभीर मुद्दों पर बात भी करती हो और आपको आत्म मंथन के लिए विवश भी करें तो फिल्म -“इन गलियों में” आपकी सही पसंद है!!

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Author: Purvanchal 24x7

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