फ़ैज़ इंकलाबी शायर, मुक्तिबोध वैचारिक कवि – कौशल किशोर – लखनऊ Purvanchal 24×7 News

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फ़ैज़ इंकलाबी शायर, मुक्तिबोध वैचारिक कवि – कौशल किशोर
रूपम मिश्रा और ताज रिज़वी ने अपनी कविताएं सुनाईं
‘उमर मेरे भाई ! हाँ अब से यही कहूँगी’
रूपम मिश्रा की कविता में पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर मार्मिक प्रहार – डॉ अमिता यादव
कवियों की विरासत को हमें सहजना है – सईदा सायरा

लखनऊ, 24 नवंबर। जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से एमबीए लाइब्रेरी, जगत नारायण रोड के सभागार में ‘यादें फैज व मुक्तिबोध’ का आयोजन हुआ। इसमें यह बात भर कर आई कि फ़ैज़ जैसे शायर व मुक्तिबोध जैसे कवि पहले की अपेक्षा आज कहीं ज्यादा जरूरी और प्रेरक हैं। इनका साहित्य दिशावाहक का काम करता है। कार्यक्रम दो सत्रों में संपन्न हुआ। पहला सत्र विचार विमर्श का तथा दूसरा कविता पाठ का था। इस आयोजन की अध्यक्षता सईदा सायरा ने की।

इस मौके पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए कवि और जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने कहा कि जहां फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ इंकलाबी शायर हैं, वही मुक्तिबोध वैचारिक कवि हैं। अपनी वैचारिक प्रखरता की कीमत दोनों को चुकानी पड़ी है। दोनों का संघर्ष शोषण के विरुद्ध है। फ़ैज़ की शायरी के अनेक रंग हैं। व्यवस्था बदलाव व बग़ावत का अगर एक रंग है, तो मोहब्बत का भी काफी चटक रंग है।

कौशल किशोर का कहना था कि फ़ैज़ ने समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष किया। उन्हें दमित भी किया गया। जेल में रखा गया। लेकिन सत्ता उन्हें अपने रास्ते से हटाने में सफल नहीं हुई। उन्होंने ‘हम देखेंगे’ ऐसी नज्म लिखी जिसकी आज भी गूंज है। इक़बाल बानो को इस नज़्म को गाने पर पाबंदी भी लगाई गई। फैज ऐसे ही शायर रहे हैं ।

कौशल किशोर ने कहा कि फ़ैज़ सत्ता के दमन का शिकार हुए तो मुक्तिबोध अपने जीवन काल में अपेक्षित हुए। उनका कविता संग्रह ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ उस वक्त आया, जब वे अपने संग्रह को देख और पढ़ पाने में असमर्थ थे। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ हिंदी कविता में ‘मील का पत्थर’ है। वे जिस अंधेरे की पड़ताल करते हैं, वह आजादी के बाद की पूंजीवादी व्यवस्था का अंधेरा है। जब वे इस कविता को लिख रहे थे, उस वक्त वह भले ही पूरी सच्चाई ना हो, लेकिन आज का यथार्थ है। वे देश के खतरनाक भविष्य को देख रहे थे, जो आज का वर्तमान है। जब वे कहते हैं कि ‘वर्तमान समाज चल नहीं सकता/ पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता’ और ‘समस्या एक है/मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों के /सभी मानव/ सुखी, सुंदर और शोषण मुक्त कब होंगे?’ तो यह बदलाव की आकांक्षा की ही अभिव्यक्ति है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में इलाहाबाद से आई रूपम मिश्रा ने अपनी करीब दर्जन भर कविताएं सुनाईं। शुरुआत उन्होंने जेल में बंद उमर खालिद पर लिखी कविता से की। वे कहती हैं – ‘उमर मेरे भाई !/हाँ अब से यही कहूँगी
/बहुत सोचा सम्बोधन को लेकर /लेकिन अब जब कलेजे में धंसी आह की तरह तुम मेरे भीतर उठने लगे हो तो/और क्या कहूँ/ये मेरी बदकिस्मती है कि हम माँ जाये नहीं हैं।’ ‘तुम्हारे पक्ष में मेरी गवाही’ में वे कहती हैं – ‘तुम्हारा नाम लेती हूँ /और मेरे जेहन में यातना का एक अक्स उभरने लगता है/राजधानी के जिस कोने में रहकर एक दिन /फोन पर किसी व्यक्ति से बात करने के जुर्म में मर्दों की अदालत में /तुम्हारी आत्मा को निर्वस्त्र करके घसीटा गया/मैं अभी तक वहीं खड़ी हूँ’।

शायर ताज रिजवी ने ग़ज़ल, रुबाई और नज्म से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने ग़ालिब की चंद पंक्तियां को याद किया और कहा कि ‘मैं आया लौटकर जब भी सफ़र से/शिकायत ही मिली सुनने को घर से।’ एक नज़्म में वे फरमाते हैं – ‘कि मैं जानता हूँ, लिया जा रहा था मेरा नाम/मैं दुश्मनों की तरह उसकी ज़िक्र-ए- ख़ैर में था।’ ताज रिज़वी अपनी ग़ज़ल में कहते हैं – ‘सूखे, पीले पत्ते अक्सर पूछा करता हैं/फूल बता कितना मुरझाना भारी पड़ता है।’

डा अमिता यादव ने कविताओं की सारगर्भित समीक्षा की। उन्होंने रूपम मिश्रा की कविताओं पर कहा कि ये पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर मार्मिक प्रहार करती हैं। सवर्ण समाज से आने वाली स्त्रियों का भ्रम तोड़ती हैं कि उन्हें कोई विशेष अधिकार है। इनमें शोषितों और वंचितों के दुख-दर्द का साझापन है। रूपम शोषण के रेशे को उभारती हैं । उन लड़कियों व स्त्रियों की बात यहां है जो कह नहीं पाती हैं, उन्हें आवाज देती हैं। रूपम की कविताओं में अवध की लोक संस्कृति और भाषा का खूब प्रयोग है। इससे कविताएं दूर तक लोगों के पास पहुंचती है।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सईदा सायरा ने कहा की फैज और मुक्तिबोध को याद करना हिंदी और उर्दू को जोड़ना है। दोनों कवि हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। फ़ैज़ कहते हैं ‘बोल, कि लब आजाद हैं तेरे’ और ‘हम देखेंगे’, वहीं मुक्तिबोध कहते हैं ‘जो है उससे बेहतर चाहिए’। दोनों कवियों की विरासत को हमेशा सहेजना है क्योंकि यह आज भी सच बोलने और लिखने के लिए प्रेरित करते हैं।

कार्यक्रम का खूबसूरत तरीके से संचालन नगीना निशा ने किया। जसम लखनऊ के सचिव फरजाना महदी ने सभी का स्वागत किया, वहीं सुचित माथुर ने आभार प्रकट किया। कार्यक्रम का समापन कवि, कथाकार व संस्कृति कर्मी अरविंद कुमार, कथाकार अवधेश प्रीत और नारायण सिंह को याद करते हुए हुआ। एक मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर शैलेश पंडित, विमल किशोर, इरा श्रीवास्तव, प्रिया वर्मा, डॉक्टर श्रद्धा बाजपेई, रेशमा हसन, रामायण प्रकाश, नूर आलम, आशीष कुमार, शांतम निधि, हेमंत बुंदेली, रोहित यादव, हर्षवर्धन चौधरी, सबाउद्दीन सिद्दीकी, जॉन अब्बास, सुरूर हसन, ए कुमार, अली कौसर, सबा कौसर आदि की उपस्थिति थी।

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Author: Purvanchal 24x7

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