मोदी का स्वर्णिम ‘विकसित भारत’: केवड़िया में खींचा गया उच्च शिक्षा का नया रोडमैप- डॉ नयन प्रकाश गांधी

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मोदी का स्वर्णिम ‘विकसित भारत’: केवड़िया में खींचा गया उच्च शिक्षा का नया रोडमैप- डॉ नयन प्रकाश गांधी

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पाँच वर्षों की समीक्षा, चुनौतियों से निपटने और छात्रों को ‘जॉब क्रिएटर’ बनाने पर केंद्रित हुआ अकादमिक जगत

महत्वपूर्ण बिंदु
☑️विराट लक्ष्य: 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (GER) को 50% तक पहुँचाने का संकल्प।

☑️’पंच संकल्प’ का मंत्र: विश्वविद्यालयों के लिए नवीन, बहु-विषयक, समग्र और भारतीय शिक्षा मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे
☑️छात्र-प्रथम दृष्टिकोण: युवाओं को ‘नौकरी खोजने वालों’ (Job Seekers) से ‘नौकरी बनाने वालों’ (Job Creators) में बदलना केंद्रीय लक्ष्य।
☑️डिजिटल क्रांति पर जोर: SWAYAM, APAAR (एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स) और SAMARTH जैसे प्लेटफॉर्म से शिक्षा व्यवस्था में आएगी पारदर्शिता और सुगमता।
☑️जड़ों से जुड़ाव: भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) और भारतीय भाषाओं को पाठ्यक्रम की मुख्यधारा में लाने की प्रतिबद्धता।
☑️अनिवार्य रोडमैप: प्रत्येक विश्वविद्यालय ‘विकसित भारत’ के विजन को अपने परिसर में लागू करने के लिए एक विशिष्ट रणनीति पत्र तैयार करेगा।
☑️शिक्षकों का सशक्तीकरण: ‘मालवीय मिशन’ के तहत संकाय विकास पर विशेष ध्यान ताकि वे नई पीढ़ी को भविष्य के लिए तैयार कर सकें।
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गुजरात के केवड़िया में, जहाँ एकता की प्रतिमूर्ति ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ भारत के दृढ़ संकल्प का प्रतीक है, हाल ही में देश के 50 से अधिक केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का दो दिवसीय महासम्मेलन संपन्न हुआ। यह केवल एक अकादमिक जमावड़ा नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के कार्यान्वयन की गहन समीक्षा और भविष्य की रणनीति तैयार करने का एक राष्ट्रीय ‘मंथन’ था। इस सम्मेलन का केंद्रीय ध्येय स्पष्ट था: भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को ‘विकसित भारत 2047’ के विराट लक्ष्य के साथ कैसे संरेखित किया जाए? केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा प्रस्तुत ‘पंच संकल्प’ और 2035 तक सकल नामांकन अनुपात (GER) को 50 प्रतिशत तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य इस मंथन के केंद्र में रहा, जो भारत के शैक्षिक भविष्य की दिशा और दशा तय करने वाला है।

पाँच वर्षों का लेखा-जोखा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू हुए अब लगभग पाँच वर्ष होने को हैं। यह समय किसी भी नीति के प्रभाव का आकलन करने और उसकी राह में आने वाली चुनौतियों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। यह सम्मेलन इसी आत्म-निरीक्षण और भविष्य की योजना का एक मंच था। श्री प्रधान ने अपने संबोधन में पिछले एक दशक की उपलब्धियों को रेखांकित किया, जिसमें कुल छात्र नामांकन का 4.46 करोड़ तक पहुँचना, महिला नामांकन में 38 प्रतिशत की वृद्धि और पीएचडी नामांकन में लगभग दोगुनी वृद्धि जैसे आँकड़े शामिल हैं।ये आँकड़े निस्संदेह उत्साहजनक हैं और दर्शाते हैं कि उच्च शिक्षा के विस्तार और समावेशिता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। महिला जीईआर का पुरुष जीईआर से अधिक होना सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ी छलांग है। लेकिन अब चुनौती केवल संख्यात्मक विस्तार की नहीं, बल्कि गुणात्मक उत्कृष्टता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और प्रासंगिकता की है। यहीं पर केवड़िया सम्मेलन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जो नीति को कागजों से निकालकर परिसरों की जीवंत वास्तविकता बनाने पर केंद्रित है।

पंच संकल्प’: उच्च शिक्षा के नए मार्गदर्शक सिद्धांत

सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक स्तंभ शिक्षा मंत्री द्वारा प्रस्तुत ‘पंच संकल्प’ की अवधारणा है। ये पाँच संकल्प विश्वविद्यालयों के लिए गुरुकुल की भूमिका निभाएंगे और अकादमिक नेतृत्व के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे:

1.अगली पीढ़ी की उभरती शिक्षा (Next-Gen Emerging Education): इसका अर्थ है शिक्षा को भविष्य की तकनीकों, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, ब्लॉकचेन और क्वांटम कंप्यूटिंग के साथ जोड़ना। हमारे विश्वविद्यालयों को अब ऐसी प्रयोगशालाएँ बनना होगा जहाँ भविष्य का निर्माण हो।

2.बहु-विषयक शिक्षा (Multidisciplinary Education): यह NEP का मूल स्तंभ है, जो ज्ञान को संकीर्ण खानों में बाँटने की प्रवृत्ति को तोड़ता है। एक इंजीनियरिंग के छात्र को दर्शनशास्त्र और एक साहित्य के विद्यार्थी को डेटा विश्लेषण की समझ होनी चाहिए। यह समग्र दृष्टिकोण ही समस्याओं के स्थायी समाधान निकाल सकता है।

3.नवीन शिक्षा (Innovative Pedagogy): रटने-रटाने की पारंपरिक शिक्षा से आगे बढ़कर अनुभवात्मक शिक्षा (Experiential Learning), प्रोजेक्ट-आधारित शिक्षा और संवाद-आधारित कक्षाओं को बढ़ावा देना। नवाचार केवल प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि कक्षाओं में भी होना चाहिए।

4.समग्र शिक्षा (Holistic Education): शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्यों का विकास और सामाजिक जिम्मेदारी का भाव जगाना है। इसमें खेल, कला, संस्कृति और सामुदायिक सेवा को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना शामिल है।

5.भारतीय शिक्षा (Indian Education): इसका तात्पर्य भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS), भारतीय भाषाओं और भारत के समृद्ध अकादमिक अतीत को गौरव के साथ मुख्यधारा की शिक्षा में एकीकृत करना है। ‘अतीत का उत्सव’ मनाकर ही हम ‘भविष्य का निर्माण’ कर सकते हैं।

यह ‘पंच संकल्प’ वास्तव में ‘अकादमिक त्रिवेणी संगम’ की संकल्पना को साकार करता है – अतीत की जड़ों से पोषण लेना, वर्तमान की चुनौतियों का मूल्यांकन करना और भविष्य के लिए वैश्विक नागरिक तैयार करना।

लक्ष्य, चुनौतियाँ और कार्ययोजना

सम्मेलन का सबसे ठोस और महत्वाकांक्षी लक्ष्य 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (GER) को 50 प्रतिशत तक पहुँचाना है। यह एक विशाल लक्ष्य है, जिसके लिए बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता होगी। चर्चा के दस विषयगत सत्र इसी रणनीति की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं

संरचनात्मक सुधार: चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (FYUP) और राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क (NCrF) को लागू करना डिग्री को अधिक लचीला, बहु-प्रवेश और बहु-निकास विकल्पों से युक्त बनाएगा। यह छात्रों को अपनी गति और रुचि के अनुसार सीखने की स्वतंत्रता देगा।

डिजिटल शिक्षा का विस्तार: SWAYAM, SWAYAM Plus, और APAAR (एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स) जैसे प्लेटफॉर्म केवल विकल्प नहीं, बल्कि शिक्षा को सुदूर और वंचित वर्गों तक पहुँचाने के अनिवार्य उपकरण हैं। क्रेडिट ट्रांसफर की सुगम प्रणाली छात्रों को देश के किसी भी संस्थान से ज्ञान अर्जित करने की सुविधा देगी।

शासन में प्रौद्योगिकी: विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक कामकाज को सुव्यवस्थित करने के लिए ‘समर्थ’ (SAMARTH) जैसा एकीकृत गवर्नेंस सिस्टम पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

समानता और समावेशिता: ‘पीएम विद्या लक्ष्मी’ और ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ जैसी योजनाएँ यह सुनिश्चित करेंगी कि वित्तीय बाधाएँ किसी भी प्रतिभाशाली छात्र की राह में रोड़ा न बनें।

भारतीय भाषाओं और IKS का एकीकरण: भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों का निर्माण और भारतीय ज्ञान प्रणालियों पर शोध को बढ़ावा देना शिक्षा को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ेगा और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करेगा।

भारतीय भाषाओं और IKS का एकीकरण: भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों का निर्माण और भारतीय ज्ञान प्रणालियों पर शोध को बढ़ावा देना शिक्षा को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ेगा और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करेगा।

अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा: राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) की स्थापना और उत्कृष्टता केंद्रों (CoE) का निर्माण भारत को केवल ज्ञान के उपभोक्ता से ज्ञान का उत्पादक बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

संकाय का विकास: कोई भी सुधार तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक शिक्षक उसके लिए तैयार न हों। ‘मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम’ शिक्षकों को नई शिक्षा प्रणाली की चुनौतियों और अवसरों के लिए तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।

कुलपतियों से यह आह्वान किया गया कि वे प्रत्येक विश्वविद्यालय के लिए एक विशिष्ट रणनीति पत्र (Strategy Paper) तैयार करें। यह कदम केंद्रीकृत नीति को स्थानीय आवश्यकताओं और शक्तियों के अनुसार ढालने की दिशा में एक स्वागत योग्य पहल है।

विश्लेषण: अवसर और संभावित बाधाएँ

केवड़िया में हुआ यह मंथन अपार संभावनाओं के द्वार खोलता है, लेकिन इसकी सफलता की राह चुनौतियों से रहित नहीं है।

अवसर

मानव संसाधन का लोकतंत्रीकरण: 50% GER का लक्ष्य भारत की विशाल युवा आबादी को उच्च शिक्षा के दायरे में लाएगा, जिससे एक कुशल और जानकार कार्यबल का निर्माण होगा।

छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण: ‘छात्र-प्रथम’ का दृष्टिकोण छात्रों को नौकरी खोजने वालों (Job Seekers) से नौकरी बनाने वालों (Job Creators), सामाजिक उद्यमियों और नैतिक नवप्रवर्तकों में बदलने की क्षमता रखता है।

वैश्विक मंच पर भारत: अनुसंधान, नवाचार और अंतरराष्ट्रीयकरण पर जोर भारत को एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है, जिससे ‘स्टडी इन इंडिया’ कार्यक्रम को बल मिलेगा।

चुनौतियाँ:

कार्यान्वयन की खाई: नीतियों का निर्माण और उनका जमीनी स्तर पर प्रभावी कार्यान्वयन दो अलग-अलग बातें हैं। कुलपतियों को नौकरशाही की सुस्ती और यथास्थितिवादी मानसिकता से निपटना होगा।

संसाधनों का आवंटन: डिजिटल बुनियादी ढाँचे के निर्माण, प्रयोगशालाओं के आधुनिकीकरण और शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए भारी वित्तीय निवेश की आवश्यकता होगी।

गुणवत्ता का प्रश्न: नामांकन में तेजी से वृद्धि के साथ गुणवत्ता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। रैंकिंग और प्रत्यायन प्रणाली को और अधिक मजबूत और पारदर्शी बनाना होगा।

मानसिकता में बदलाव: सबसे बड़ी चुनौती छात्रों, शिक्षकों और प्रशासकों की मानसिकता में बदलाव लाने की है – रटने की संस्कृति से आलोचनात्मक चिंतन, जिज्ञासा और नवाचार की संस्कृति की ओर बढ़ना एक क्रमिक प्रक्रिया है।

निष्कर्ष: एक नए युग का शंखनाद

केवड़िया का कुलपति सम्मेलन केवल एक बैठक नहीं, बल्कि भारत के अकादमिक भविष्य के लिए एक दृढ़ संकल्प है। यह सम्मेलन इस बात का प्रतीक है कि सरकार और अकादमिक जगत ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक साझा दृष्टिकोण के साथ काम कर रहे हैं। ‘पंच संकल्प’ और 50% GER का लक्ष्य केवल आँकड़े नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत का सपना है जहाँ ज्ञान सर्वसुलभ हो, जहाँ नवाचार जीवन का एक तरीका हो, और जहाँ के युवा अपनी जड़ों पर गर्व करते हुए दुनिया का नेतृत्व करने के लिए तैयार हों।इस मंथन से निकला अमृत तभी सार्थक होगा जब प्रत्येक विश्वविद्यालय अपने परिसर में इन सिद्धांतों को जीवंत करेगा। सफलता रणनीति पत्रों के निर्माण में नहीं, बल्कि कक्षाओं में बदलते संवाद, प्रयोगशालाओं में होते नवाचार और स्नातकों के आत्मविश्वास में परिलक्षित होगी। यह एक लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्रा है, लेकिन केवड़िया में जो संकल्प लिया गया है, वह निश्चित रूप से भारत को 21वीं सदी का ज्ञान महाशक्ति बनाने की दिशा में एक निर्णायक शंखनाद है।

लेखक परिचय :

डॉ. नयन प्रकाश गांधी ,प्रख्यात युवा प्रबंधन विश्लेषक, सामाजिक विचारक एवं चर्चित स्तंभकार ,समसामयिक विषयों पर लेखन में सक्रिय

Purvanchal 24x7
Author: Purvanchal 24x7

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