शाहगंज में सजी परंपरा और आस्था की चमक — ऐतिहासिक चूड़ी मेला शुरू
सीता श्रृंगार की याद में सजे रंग-बिरंगे बाजार, महिलाओं का लगा मेला, पुरुषों का प्रवेश वर्जित
राजकुमार अश्क़ की विशेष रिपोर्ट
शाहगंज (जौनपुर)। नगर के प्राचीन चूड़ी मोहल्ले में रविवार से आरंभ हुआ ऐतिहासिक चूड़ी मेला, जिसे जनमानस “सीता श्रृंगार मेला” के नाम से जानता है, एक बार फिर शाहगंज की फिज़ा में परंपरा, श्रद्धा और लोक-संस्कृति की महक बिखेर रहा है।
लगभग डेढ़ सौ वर्षों से निरंतर लगने वाला यह मेला आज भी अपनी लोक रंगत और सामाजिक एकता की पहचान बनाए हुए है।

सीता श्रृंगार की स्मृति से जुड़ी लोककथा
लोककथाओं के अनुसार, भगवान श्रीराम, माता सीता और भइया लक्ष्मण लंका विजय के उपरांत अयोध्या लौटते समय शाहगंज मार्ग से गुज़रे थे। कहा जाता है कि माता सीता ने यहाँ अपनी सखियों के संग श्रृंगार की वस्तुएँ — जैसे चूड़ियाँ, बिंदी और कंघी आदि खरीदी थीं।
इसी स्मरण में यह मेला “सीता श्रृंगार मेला” के रूप में आज भी मनाया जाता है। युग बदल गए, लेकिन यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी सदियों पहले थी।

धार्मिकता और उत्सव का संगम
नगर के मुख्य मार्गों, गलियों और मंदिरों को झालरों, विद्युत लाइटों और पुष्प सज्जा से ऐसे सजाया गया है मानो पूरा शाहगंज दुल्हन बन गया हो।रंग-बिरंगे बाजार और रौनक से भरपूर गलियाँ मेले में सैकड़ों की संख्या में अस्थायी दुकानें सजी हैं — कहीं चूड़ियों की खनक है, कहीं बिंदी और साड़ी के स्टॉल पर महिलाओं की भीड़।वाराणसी, मऊ, सुल्तानपुर, लखनऊ और आज़मगढ़ फिरोजाबाद शहरों और जिलों से व्यापारी यहाँ अपनी दुकानें लेकर आते हैं।
शाहगंज की गलियों में महिलाओं की चहल-पहल से ऐसा प्रतीत होता है मानो श्रृंगार और उल्लास का सागर उमड़ पड़ा हो।

महिलाओं का मेला — अनोखी परंपरा
इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पुरुषों का प्रवेश पूर्णतः वर्जित होता है यह मेला सिर्फ महिलाओं और बालिकाओं का होता है वे खुलकर खरीदारी करती हैं, लोकगीत गाती हैं, और एक-दूसरे के संग श्रृंगार बाँटती हैं।
यह अनोखी परंपरा वर्षों से चली आ रही है, और इसी कारण यह मेला पूर्वांचल का सबसे विशिष्ट उत्सव मेला माना जाता है।

गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक
मेले की एक और खूबसूरत झलक इसकी सांप्रदायिक एकता है।
हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग इसमें समान श्रद्धा और सम्मान से भाग लेते हैं कोई आयोजन में सहयोग करता है, तो कोई सुरक्षा या सजावट में मदद। हर वर्ग, जाति के लोग अपनी दुकान लगाते हैं, जिसमें सभी लोग बिना किसी भेदभाव के खरीदारी करते हैं।
यही कारण है कि यह मेला केवल श्रृंगार का उत्सव नहीं बल्कि आपसी प्रेम सौहार्द और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुका है।

सुरक्षा और व्यवस्थाओं की चाक-चौबंद तैयारी
मेले के दौरान नगर प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किए रहते हैं
नगर के सभी प्रवेश द्वारों पर महिला पुलिसकर्मियों की विशेष तैनाती की गई है।
नगर पालिका ने स्वच्छता और प्रकाश व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया है, ताकि आने-जाने वालों को किसी असुविधा का सामना न करना पड़े।

लोकसंस्कृति की जीवंत झलक
जैसे ही सूर्य ढलता है, पूरे मोहल्ले की गलियों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ रोशनी में झिलमिलाने लगती हैं।
ऐसा लगता है मानो शाहगंज अपने गौरवशाली इतिहास और जीवंत लोक परंपरा से एक बार फिर साक्षात्कार कर रहा हो।

स्थानीय नागरिकों की भावनाएँ
स्थानीय नागरिक रामाशंकर तिवारी बताते हैं “यह मेला सिर्फ बाजार नहीं, यह हमारी विरासत है। जब हमारी माताएँ और दादियाँ यहाँ आती थीं, तब हम बच्चे हुआ करते थे। आज हमारी बेटियाँ उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।”
वहीं नगर की एक महिला ने बताया कि “यह मेला हिन्दू-मुस्लिम एकता का उदाहरण है। यहाँ हर कोई मुस्कान लेकर आता है, किसी धर्म की दीवार नहीं होती है
शाहगंज का चूड़ी मेला आज भी परंपरा, आस्था और एकता का उजला प्रतीक बना हुआ है।
यह सिर्फ एक स्थानीय उत्सव नहीं, बल्कि एक ऐसा सांस्कृतिक पर्व है जो बताता है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता और साझा संस्कृति में है।
स्रोत उपरोक्त दी गयी जानकारी लोक मान्यताओ, परंपराओं, सोशलमीडिया, एवं स्थानीय लोगों द्वारा दी जानकारी के आधार पर है











