फ़्रंचेस्का ओर्सीनी पर प्रतिबंध: कुछ बेहद जरूरी सवाल
(जन संस्कृति मंच)
जन संस्कृति मंच ने हिंदी की विद्वान और लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में प्रोफेसर एमेरिटस फ़्रंचेस्का ओर्सीनी को वैध वीजा होने के बावजूद भारत में आने से रोकने की भर्त्सना करते हुए इसे शर्मनाक बताया है। फ़्रंचेस्का ओर्सीनी 20 अक्टूबर की रात दिल्ली पहुंची थी लेकिन उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट से ही वापस भेज दिया गया। इमीग्रेशन अधिकारियों ने बताया कि उन्हें देश में प्रवेश की अनुमति नहीं है। उन्हें डिपोर्ट करने का कोई कारण भी नहीं बताया गया।
साहित्यिक इतिहासकार फ़्रंचेस्का ओर्सीनी ने अपना पूरा जीवन हिंदी साहित्य के अध्ययन में लगाया है। उन्होंने तीन दशक से अधिक समय से दक्षिण एशिया की साहित्यिक संस्कृतियों में बहुभाषिकता कैसे काम करती है, पर शोध-अध्ययन किया है। उन्होंने इटली के वेनिस विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातक करने के बाद भारत के केंद्रीय हिंदी संस्थान और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। उन्होंने उन्नीसवीं सदी में हिंदी और उर्दू में व्यावसायिक प्रकाशन पर काम किया जो ‘ प्रिंट एंड प्लेजर : पापुलर लिटरेचर एंड एंटरटेनिंग फिक्शन इन कोलोनियल नॉर्थ इंडिया’ नाम से किताब के रूप में प्रकाशित हुआ। उन्होंने “उत्तर भारतीय साहित्यिक संस्कृति और इतिहास” पर एक शोध परियोजना चलाई, जिसका उद्देश्य प्रारंभिक आधुनिक उत्तर भारतीय साहित्य के इतिहास पर एक बहुभाषी परिप्रेक्ष्य से पुनर्विचार करना था। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं जिनमें -‘द हिंदी पब्लिक स्फीयर 1920-40 : लैंग्वेज एण्ड लिटरेचर इन द एज ऑफ नेशलिज्म‘ , बिफोर द डिवाइड हिन्दी एंड उर्दू लिटररी कल्चर, आफ्टर तैमूर लेफ्ट, (समीरा शेख के साथ सह-संपादित, 2014), टेलिंग्स एंड टेक्स्ट्स (कैथरीन स्कोफील्ड के साथ सह-संपादित, 2015) प्रमुख हैं।
द वायर में छपी खबर के मुताबिक हाल के वर्षों में वैध वीजा होने के बावजूद भारत में प्रवेश से रोकी जाने वाली फ़्रंचेस्का ओर्सीनी ऐसी चौथी विदेशी शोधकर्ता हैं। इसके पहले ब्रिटेन के मानव विज्ञानी फिलिप्पो ओसेला, ब्रिटिश आर्किटेक्चर प्रोफेसर लिंडसे ब्रीम्नर, ब्रिटेन स्थित कश्मीरी अकादमिक निताशा को वापस भेजा गया था। स्वीडन में रहने वाले अकादमिक अशोक स्वेन का ओसीआई कार्ड भी रद्द कर दिया गया ।
इस मुद्दे पर भारत के बौद्धिक और अकादमिक हलकों से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। इसे बौद्धिक सेंसरशिप की कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। विवाद होने के बाद अनेक अखबारों में ऐसी रिपोर्टें आई हैं जिनमें कहा जा रहा है कि फ़्रंचेस्का ओर्सीनी टूरिस्ट वीजा के नियमों का उल्लंघन करने के कारण पहले से ब्लैकलिस्टेड थीं। कहा जा रहा है कि वे अपनी पिछली भारत यात्रा में टूरिस्ट वीजा पर रहते हुए अकादमिक और शोध संबंधी गतिविधियों में शामिल हुई थीं और पहले से ब्लैकलिस्टेड होने के कारण ही उन्हें हवाई अड्डे से वापस कर दिया गया। सरकार की ओर से अभी तक कोई सीधा स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
जन संस्कृति मंच ने कहा है कि यहां कुछ सवाल उठाए जाने बेहद जरूरी हैं:
पहला, क्या सरकार ने इस संबंध में कोई सार्वजनिक सूचना जारी की थी कि फ़्रंचेस्का ओर्सीनी को ब्लैक लिस्ट किया गया है? सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। सवाल यह है कि अगर कोई विदेशी विद्वान टूरिस्ट वीजा का उल्लंघन करने के कारण ब्लैक लिस्ट किया जाता है तो सरकार इस जानकारी को सार्वजनिक क्यों नहीं करना चाहती? वह क्यों नहीं चाहती कि देश-विदेश के विद्वान इस से अवगत हों और जाने अनजाने टूरिस्ट वीजा का उल्लंघन करने से बचें?
दूसरा सवाल यह उठता है कि क्या खुद फ़्रंचेस्का को उनके ब्लैक लिस्ट किए जाने की जानकारी दी गई? क्या उन्हें यह बताया गया कि उन्होंने किस तरह से वीजा नियमों का उल्लंघन किया है और किस प्रक्रिया के तहत उन पर कार्रवाई की गई है? यह संभव नहीं लगता कि फ़्रंचेस्का ओर्सीनी को इसकी जानकारी दी गई हो, फिर भी उन्होंने भारत में प्रवेश करने की अवैध कोशिश की हो। और अगर की तो क्या इसकी जानकारी उनके मूल देश को दी गई है?
तीसरे, यह भी स्पष्ट नहीं है कि अगर उन्होंने टूरिस्ट वीजा का उल्लंघन किया तो उनका वीजा रद्द क्यों नहीं किया गया, जबकि ऐसा करना सबसे तर्कसंगत कदम होता। स्पष्ट यह भी नहीं है कि वीजा रद्द न करने की सूरत में किसी को ब्लैक लिस्ट करने का क्या अर्थ है।
जाहिर सी बात है कि अगर उन्हें समुचित जानकारी दी गई होती या उनका वीजा रद्द कर दिया गया होता तो उन्होंने भारत में प्रवेश करने के लिए तदनुरूप आवश्यक कदम उठाए होते।
अब तक अनुत्तरित इन सवालों के आलोक में भारत सरकार के इस कदम से दुनिया भर में देश की बौद्धिक स्वतंत्रता की स्थिति के बारे में संशय उत्पन्न हुए हैं। जन संस्कृति मंच ने अपने बयान में यह मांग की है कि सरकार इन सभी बिंदुओं पर अपनी स्थिति तत्काल स्पष्ट करे।
देश में बौद्धिक स्वतंत्रता के बारे में संदेह की स्थिति यहां की अकादमिक और बौद्धिक गतिविधियों के लिए बेहद नुकसानदेह है। संशय की यह रात तत्काल समाप्त की जानी चाहिए।
जन संस्कृति मंच ने कहा कि मोदी सरकार एक तरफ भारत को विश्वगुरु बनाने का डंका पीटती है तो दूसरी तरफ विदेशी विद्वानों को भारत आने से रोकती है, देश के लेखकों-पत्रकारों की किताबों पर प्रतिबंध लगाती है, उनके व्याख्यानों-कार्यक्रमों को रोकती है, केस दर्ज करती है और उन्हें जेल भी भेजती है। विश्वविद्यालयों और उच्च अध्ययन संस्थानों में छात्र-छात्राओं की साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को रोका जाता है, शिक्षकों पर हमले किए जाते हैं। विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वायत्तता को खत्म कर फासीवादी परियोजना संचालित की जा रही है। केंद्र और राज्यों की भाजपा सरकारों ने बोलने की आजादी, अकादमिक स्वतंत्रता का गला घोंट दिया है। यही कारण है कि वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स, अकादमी स्वतंत्रता इंडेक्स में भारत लगातार निचले पायदान पर जा रहा है। जन संस्कृति मंच ने देश भर के छात्रों और शिक्षकों से इस वातावरण का मुकाबला करने के लिए एकजुट होने की अपील की है।










