डा अम्बेडकर की प्रतिमा को हटाने की कोशिश दलित सम्मान पर प्रहार,यह घटना दलित व महिला उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव का उदाहरण – लखनऊ Purvanchal 24×7 News

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भाकपा माले के जांच दल द्वारा खंतारी गांव की घटना पर न्यायिक जांच की मांग,डा अम्बेडकर की प्रतिमा को हटाने की कोशिश दलित सम्मान पर प्रहार,यह घटना दलित व महिला उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव का उदाहरण

लखनऊ, 14 अप्रैल। बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर की 134वीं जयंती के दो दिन पहले बक्शी का तालाब के खंतारी गांव में अंबेडकर की प्रतिमा को जबरन हटाने की कोशिश की गई तथा इसका विरोध करने पर दलित समुदाय के साथ पुलिस प्रशासन ने जो बर्बरता दिखाई, वह योगी सरकार की दलित विरोधी सोच का नमूना है। पुलिस की इस बर्बरता के खिलाफ गाँव की दलित महिलाएँ सामने आईं और शांतिपूर्ण प्रतिरोध किया तो पुलिस ने उनके कपड़े फाड़े, बेरहमी से पीटा, आंसू गैस के गोले छोड़े और उन पर फायरिंग की।

खंतारी गांव में पुलिस द्वारा की गई इस कार्रवाई की जांच करने के लिए भाकपा माले का सात सदस्यीय जांच दल पार्टी के जिला प्रभारी रमेश सिंह सेंगर के नेतृत्व में खंतारी गाँव, बक्शी का तालाब का दौरा किया। इस दल में राजीव गुप्ता (आरवाईए), कमला गौतम (ऐपवा), छोटे लाल रावत (एआईकेएम), मधुसूदन मगन (एआईसीसीटीयू), शांतम निधि (जसम) और दिग्विजय सिंह (आइसा) शामिल थे। इस दल ने पीड़ित लोगों के साथ ग्रामीणों से बातचीत की। उस जगह का भी मुआयना किया जहां डा अम्बेडकर की प्रतिमा को लेकर पुलिस प्रशासन द्वारा विवाद पैदा किया गया था। जांच दल ने घटना के विविध पहलुओं पर विचार के बाद अपनी रिपोर्ट जारी की है। वह संक्षेप में इस प्रकार है।

यह घटना खंतारी गाँव में डॉ. भीमराव अंबेडकर की पहले से स्थापित प्रतिमा को जबरन हटाने को लेकर हुई। पिछले तीन वर्षों से दलित समुदाय ने शासन-प्रशासन से इसकी अनुमति मांगी थी, लेकिन बार-बार टालमटोल किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि एसडीएम सतीश चंद्र त्रिपाठी ने अनुमति इसलिए नहीं दी क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उनका प्रमोशन रुक जाएगा। हालांकि जनवरी 2025 में उन्होंने मौखिक रूप से अनुमति दे दी थी, जिसके बाद ही प्रतिमा स्थापित की गई।

12 अप्रैल को गाँव के प्रधान बीरेंद्र कुमार रावत को पुलिस चौकी पर बुलाया गया। जब वे वापस नहीं लौटे तो ग्रामीणों को कुछ शंका हुई और वे उन्हें खोजने के लिए थाना गए। पर वे वहाँ नहीं मिले। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पुलिस उन्हें एक चलती गाड़ी में बंद करके रखे हुए थी ताकि गाँव में प्रतिरोध संगठित न हो सके। इसी समय अच्छी संख्या में यूपी पुलिस और पीएसी गाँव में पहुँची और बिना किसी लिखित आदेश या शिकायत के स्थापित प्रतिमा को हटाने की कोशिश करने लगी। जब ग्रामीणों ने इसका कानूनी आधार पूछा, तो पुलिस ने कहा कि “हम ही शिकायतकर्ता हैं।” साथ ही, पुलिस ने दलित समुदाय से कहा कि वे गाँव के “पंडितों” से माफ़ी माँगें। इस संबंध में यह नहीं कहा गया कि किन पंडितों से माफ़ी मांगी जाए और फिर माफी किस बात की?

पुलिस की कार्रवाई का ग्रामीणों के द्वारा विरोध किया गया। इसके बाद पुलिस ने हमला शुरू कर दिया । गाँव की दलित महिलाएँ भी सामने आईं और शांतिपूर्ण प्रतिरोध किया। पुलिस ने उनके साथ भी बदसलूकी की। कपड़े फाड़े। शांति पूर्ण तरीके से विरोध कर रहे लोगों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। फायरिंग भी हुई। पुलिस के इस हमले में अनेक लोग घायल हो गए। यह सब कुछ डॉ. अंबेडकर की मूर्ति के सामने हुआ, जो इस शासन की असली मानसिकता को दर्शाता है। इसमें महिलाएं और पुरुष घायल हुए। प्रशासन ने घायलों को चिकित्सा सुविधा देने से इंकार कर दिया गया, यह कहते हुए कि बिना पुलिस अनुमति के मेडिकल जांच नहीं की जा सकती। यह न केवल ग़ैरक़ानूनी है बल्कि अमानवीय भी है।

जांच दल जब गाँव पहुँचा, उस वक्त गाँववाले धरने पर बैठे हुए थे। न तो किसी पुलिसकर्मी पर एफआईआर दर्ज हुई है, न ही किसी अधिकारी पर कार्रवाई की गई है। इस घटना के संबंध में जांच दल का निष्कर्ष है कि यह दलित व महिला उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव का स्पष्ट उदाहरण है। प्रतिमा को हटाने की कोशिश तथा दलित समुदाय से माफ़ी मांगने की मांग, ये सब दलित अस्मिता पर हमला है। पुलिस का दमन और सत्ता की बर्बरता साफ दिखती है। बिना किसी वैध आदेश के बल प्रयोग लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है। महिलाओं के कपड़े फाड़ना, उनके साथ बदसलूकी यौन हिंसा है। यह दलित महिलाओं के आत्मसम्मान को कुचलने की कोशिश है। घायल ग्रामीणों को मेडिकल सुविधा न देना मानवीयता और संविधान दोनों के खिलाफ है। इस पूरी घटना पर प्रशासनिक चुप्पी है। पुलिस और प्रशासन के लोग पूरी तरह से दोषी हैं लेकिन अब तक कोई जवाबदेही तय नहीं की गई।

भाकपा (माले) ने तथ्यों की रोशनी में मांग की है कि घटना की न्यायिक जांच कराई जाए जिसकी निगरानी हाईकोर्ट के सिटिंग जज करें। दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कर उन्हें निलंबित किया जाए। एसडीएम सतीश चंद्र त्रिपाठी के खिलाफ जातिगत भेदभाव और सत्ता के दुरुपयोग का मुकदमा चलाया जाए। सभी घायलों को चिकित्सा सुविधा और उचित मुआवज़ा दिया जाए। डॉ. अंबेडकर की स्थापित प्रतिमा को पूर्ण कानूनी सुरक्षा दी जाए और उसे हटाने के सभी प्रयास बंद हों। महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिला पुलिस बल की तैनाती हो। प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगे और दलित समुदाय के आत्म-सम्मान के अधिकार को मान्यता दे।

माले के जांच दल का निष्कर्ष है कि खंतारी की यह घटना उत्तर प्रदेश सरकार की दलित विरोधी सोच और दमनकारी शासन प्रणाली को उजागर करती है। अंबेडकर की मूर्ति को हटाना सिर्फ़ एक मूर्ति को नहीं, बल्कि दलित अस्मिता और संवैधानिक मूल्यों को मिटाने की कोशिश है। भाकपा (माले) और इसके सभी जनसंगठन खंतारी के संघर्षशील जन समुदाय के साथ हैं, और यह मुद्दा पूरे प्रदेश में उठाया जाएगा।

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Author: Purvanchal 24x7

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