छठ महापर्व: आस्था और विज्ञान का अद्भुत संगम – राजकुमार अश्क Purvanchal 24×7 News

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छठ महापर्व: आस्था और विज्ञान का अद्भुत संगम -राजकुमार अश्क़

भारत की संस्कृति में हर पर्व केवल धार्मिक नहीं होता, बल्कि उसके पीछे गहरा वैज्ञानिक संदेश भी छिपा होता है। छठ महापर्व इसका सबसे सुंदर उदाहरण है — यह पर्व आध्यात्मिकता, अनुशासन, पर्यावरण और स्वास्थ्य विज्ञान का अद्भुत मेल है। बिहार से आरंभ होकर आज यह पर्व पूरे भारत ही नहीं, विश्व के कई हिस्सों में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

चार दिवसीय अनुशासन और पवित्रता का पर्व

दीपावली के चार दिन बाद मनाया जाने वाला यह पर्व चार दिनों तक चलता है।

पहला दिन – नहाय खाय: व्रती (व्रत रखने वाले) प्रातः स्नान कर नए वस्त्र धारण करते हैं और शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं।

दूसरा दिन – खरना: इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को गुड़-चावल की खीर व रोटी खाकर उपवास तोड़ते हैं।

तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य: व्रती महिलाएं नदी, तालाब या पोखरे में खड़ी होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं और संतान की दीर्घायु की कामना करती हैं।

चौथा दिन – उषा अर्घ्य: अगली सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और इसके साथ व्रत का समापन होता है।

यह व्रत अत्यंत कठिन माना गया है क्योंकि व्रती को लगभग 36 घंटे तक निर्जल रहना पड़ता है।


छठ का धार्मिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों में छठ व्रत की उत्पत्ति के कई उल्लेख मिलते हैं।

माना जाता है कि माता द्रौपदी ने इस व्रत को श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में किया था, जिसके फलस्वरूप पांडवों को पुनः अपना राज्य प्राप्त हुआ।

एक अन्य कथा के अनुसार माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद बिहार के मुंगेर जिले में इस व्रत का पालन किया था, इसलिए इसे बिहार का प्रमुख महापर्व माना जाता है।

इसके अतिरिक्त राजा प्रियवद और रानी मालिनी की कथा में उल्लेख मिलता है कि षष्ठी माता की कृपा से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी।

षष्ठी देवी को सूर्य की बहन और ईश्वर की मानस पुत्री देवसेना कहा गया है। वे सृष्टि की छठी प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, इसलिए इन्हें षष्ठी माता कहा गया।

जाति-पांति से ऊपर मानवता का पर्व

छठ व्रत की एक विशेषता यह भी है कि यह सामाजिक एकता और समानता का प्रतीक है। जब महिलाएं एक साथ जल में खड़ी होकर सूर्य को अर्घ्य देती हैं, तब जाति-पांति की सारी दीवारें टूट जाती हैं। इस समय न कोई ऊंच-नीच होती है, न कोई भेदभाव। सभी एक समान श्रद्धा से सूर्यदेव की आराधना करते हैं — यही इसका सामाजिक संदेश है।


छठ का वैज्ञानिक आधार
छठ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इसके पीछे कई वैज्ञानिक तथ्य भी छिपे हैं।

  1. सूर्य की ऊर्जा और विटामिन-डी:
    कार्तिक मास में शरद ऋतु के दौरान सूर्य की किरणें अत्यंत लाभकारी होती हैं। सुबह और शाम सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर को विटामिन-डी प्राप्त होता है, जो हड्डियों और प्रतिरक्षा तंत्र के लिए आवश्यक है।
  2. प्रकाश का रंग विज्ञान:
    जब व्यक्ति जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता है, तब सूर्य की किरणें जल से होकर गुजरती हैं और स्कैटरिंग, रिफ्लेक्शन और डिस्पर्शन जैसी प्रक्रियाओं से गुजरकर शरीर पर पड़ती हैं। इससे शरीर के न्यूरॉन सक्रिय होते हैं और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  3. टॉक्सिफिकेशन प्रक्रिया:
    निर्जला व्रत के दौरान शरीर प्राकृतिक डिटॉक्स प्रक्रिया से गुजरता है। जब व्रती 36 घंटे तक उपवास रखते हैं, तो शरीर के विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और शरीर शुद्ध होता है।
  4. खगोलीय परिवर्तन:
    वैज्ञानिकों के अनुसार, षष्ठी तिथि को सूर्य की पराबैंगनी किरणें (UV rays) वातावरण में असामान्य रूप से एकत्र होती हैं। उस समय जल में खड़े होकर अर्घ्य देने से इन किरणों के दुष्प्रभावों से शरीर सुरक्षित रहता है।
  5. प्राकृतिक भोजन और स्वास्थ्य संतुलन:
    छठ में तैयार किए जाने वाले प्रसाद जैसे ठेकुआ, गुड़, चावल, गन्ना, नारियल आदि में प्राकृतिक कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम और ग्लूकोज की पर्याप्त मात्रा होती है। ये शरीर को ऊर्जा देने के साथ संतुलन भी बनाए रखते हैं।
    आस्था में विज्ञान, विज्ञान में आस्था
    छठ पर्व यह संदेश देता है कि धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
    सूर्य की उपासना केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव शरीर के बीच संतुलन का प्रतीक है। यह पर्व हमें संयम, स्वच्छता, अनुशासन, सामूहिकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव सिखाता है।
    निष्कर्ष
    छठ पूजा एक ऐसा पर्व है जिसमें मानव शरीर, प्रकृति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का समन्वय होता है।
    यह केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि जीवन विज्ञान का उत्सव है —
    जहां सूर्य की किरणें शरीर को शक्ति देती हैं, और श्रद्धा मन को शुद्ध करती है।
    यही छठ पर्व का असली संदेश है —
    “सूर्य ही जीवन है, और जीवन ही छठ है।”
    स्रोत:-उपरोक्त दी गई सारी जानकारी लोक मान्यता, कथा प्रवचन,सोशलमीडिया, तथा अन्य माध्यमों से एकत्र की गई है।
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Author: Purvanchal 24x7

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